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भूख के आगे बेबस हुई ममता: बच्चों की भूख नहीं देख पाई मां, अनाथालय भेजने की लगाई गुहार

Published: Jun 22, 2026 4:54 PM  •  Updated: Jun 22, 2026 4:56 PM
HIGHLIGHTS
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रांची। मां को दुनिया में त्याग, ममता और संघर्ष की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है। कहा जाता है कि एक मां अपने बच्चों की खुशी के लिए हर दर्द सह लेती है, हर मुश्किल से लड़ जाती है। लेकिन जब गरीबी, भूख और बेबसी इंसान को चारों तरफ से घेर लेती है, तब हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच जाते हैं जहां एक मां का दिल भी टूटने लगता है। राजधानी रांची के पिस्का नगड़ी इलाके से सामने आई एक ऐसी ही दर्दनाक कहानी हर संवेदनशील इंसान की आंखें नम कर देने वाली है।

यह कहानी है सीमा लोहरा की, जो आज जिंदगी के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। कभी अपने छोटे से परिवार के साथ सपने देखने वाली सीमा आज दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि एक मां को अपने ही बच्चों को खुद से दूर करने की बात कहनी पड़ रही है।

पति की मौत के बाद बिखर गई दुनिया

सीमा की जिंदगी में दुखों का पहाड़ तब टूट पड़ा जब पिछले वर्ष दिसंबर महीने में बीमारी के कारण उनके पति का निधन हो गया। पति के जाने के साथ ही परिवार का एकमात्र सहारा भी खत्म हो गया। जिस घर में कभी उम्मीदें थीं, वहां अब सन्नाटा और चिंता ने जगह ले ली। पति की मौत के बाद सीमा पूरी तरह अकेली पड़ गईं। उनके कंधों पर दो मासूम बच्चों की जिम्मेदारी आ गई। एक बेटा तीन साल का है, जबकि दूसरा बच्चा महज चार महीने का है। इन मासूम आंखों को देखकर सीमा हर दिन जीने की हिम्मत जुटाती हैं, लेकिन भूख और गरीबी ने उनकी ताकत को भी कमजोर कर दिया है।

गोद में चार महीने का बच्चा, हाथ में रोजगार की तलाश

पति के जाने के बाद सीमा ने हार नहीं मानी। वह रोज सुबह अपने चार महीने के बच्चे को गोद में लेकर काम की तलाश में निकल पड़ती हैं। दिन भर दर-दर भटकने के बाद जब शाम होती है, तो उनके हाथ खाली होते हैं और आंखों में आंसू। भूख मिटाने के लिए उनके पास कुछ नहीं होता। कई बार ऐसा भी हुआ कि घर में चूल्हा तक नहीं जला। एक मां खुद भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चों की भूख नहीं देख सकती। यही दर्द सीमा को अंदर ही अंदर तोड़ रहा है।

जब एक मां ने कहा- मेरे बच्चों को अनाथालय भेज दीजिए

भूख से बिलखते बच्चों को देखकर सीमा की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं लेते। चार महीने के बच्चे को दूध पिलाने के लिए उनके शरीर में भी पर्याप्त ताकत नहीं बची है। तीन साल का मासूम जब खाने के लिए रोता है, तो एक मां का कलेजा छलनी हो जाता है। आखिरकार दर्द और बेबसी से टूटी सीमा ने भर्राई आवाज में जो कहा, उसे सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाए।

मुझसे मेरे बच्चों की भूख देखी नहीं जाती। कोई मेरे बच्चों को किसी अनाथालय में रखवा दीजिए। कम से कम वहां उन्हें समय पर खाना तो मिलेगा। उनका भविष्य तो बच जाएगा। मैं उन्हें भूख से तड़पते नहीं देख सकती। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक मां के टूटे हुए दिल की चीख है। वह अपने बच्चों से दूर नहीं होना चाहती, लेकिन उनकी भूख उससे देखी नहीं जा रही। ममता हारना नहीं चाहती, मगर गरीबी ने उसे घुटनों पर ला खड़ा किया है।

इंसानियत के लिए एक सवाल

किसी भी मां के लिए अपने बच्चों को खुद से अलग करने की बात सोचना भी आसान नहीं होता। सीमा लोहरा की यह पुकार केवल उनकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है। आज सीमा को सहानुभूति से ज्यादा जरूरत है मदद की। उन्हें राशन चाहिए, बच्चों के लिए दूध चाहिए, रहने के लिए सुरक्षित छत चाहिए और सबसे बढ़कर ऐसा रोजगार चाहिए जिससे वह सम्मान के साथ अपने बच्चों का पालन-पोषण कर सकें।

समाज के सक्षम लोगों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन से अपील है कि इस परिवार तक मदद पहुंचाई जाए। किसी मां को अपने बच्चों को अनाथालय भेजने की गुहार न लगानी पड़े, यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।

हो सकता है किसी की छोटी-सी मदद सीमा के घर में फिर से चूल्हा जला दे। किसी का सहयोग दो मासूम बच्चों की भूख मिटा दे। और शायद किसी की संवेदनशीलता एक टूटी हुई मां की आंखों में फिर से उम्मीद की रोशनी लौटा दे।

इसे भी पढ़े: बाल श्रम के खिलाफ संयुक्त अभियान, दो बच्चों को बाल मजदूरी से कराया गया मुक्त

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