राजस्थान के जल जीवन मिशन भ्रष्टाचार मामले में महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को राहत, त्वरित सुनवाई को बताया मौलिक अधिकार
रांची। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन भ्रष्टाचार मामले में महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को मुकदमे की सुनवाई में देरी के कारण लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि जमानत से इनकार कर अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखना, परिस्थितियों के आधार पर, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि भ्रष्टाचार के आरोप गंभीर होने के बावजूद केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर विचार करते हुए मामले की परिस्थितियों और मुकदमे में संभावित देरी को महत्वपूर्ण माना।
क्या है जल जीवन मिशन भ्रष्टाचार मामला?
यह मामला राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) की ओर से जारी टेंडरों में कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित है। आरोप है कि ‘श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी’ और ‘श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी’ ने कथित तौर पर फर्जी कार्य-पूर्णता प्रमाण पत्रों के आधार पर वर्ष 2021 से 2023 के बीच लगभग 979.45 करोड़ रुपये के 104 वर्क ऑर्डर हासिल किए।
मामले की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने की। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 30 अक्टूबर 2024 को प्राथमिकी दर्ज होने के बाद महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को गिरफ्तार किया गया। राजस्थान हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2026 को दोनों की नियमित जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जांच पूरी, फिर भी मुकदमे में देरी की आशंका
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि दोनों आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं। मामले से संबंधित प्रमुख दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी जांच एजेंसी के कब्जे में हैं। ऐसे में हिरासत में रखकर आगे पूछताछ की जरूरत जमानत पर विचार करते समय एक महत्वपूर्ण पहलू थी।
अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि मामले में कुल 22 आरोपी हैं, तीन आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं और अभियोजन पक्ष के 124 गवाह हैं। इसके अतिरिक्त, 20 हजार से अधिक पन्नों के 192 दस्तावेजों का उल्लेख किया गया। मुकदमे की व्यापकता को देखते हुए सुनवाई में लंबा समय लगने की आशंका जताई गई।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
मामले में महेश चंद्र जोशी की उम्र करीब 72 वर्ष बताई गई है। दोनों आरोपियों की हिरासत की अवधि, जांच की स्थिति, साक्ष्यों की प्रकृति और मुकदमे के शीघ्र पूरा होने की संभावना सहित विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के जमानत खारिज करने वाले आदेश को रद्द करते हुए दोनों आरोपियों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत के फैसले से यह संदेश सामने आया कि आपराधिक मामलों में आरोपों की गंभीरता और आरोपी के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
हालांकि, जमानत मिलने का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है। मामले में आरोपों की सत्यता का निर्धारण मुकदमे के दौरान साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।









