नौ दिनों तक शक्ति की आराधना, लेकिन समाज में बेटियों की सुरक्षा आज भी सवालों के घेरे में! जयकारे तभी सार्थक जब हर बेटी जिए निर्भय
संपादकीय / राजेश दुबे। मंदिरों में मां दुर्गा के जयकारे गूंज रहे हैं। शंखध्वनि और घंटियों की आवाज के बीच आरती हो रही है। घरों में कलश स्थापित हैं, पूजा की थालियां सजी हैं और कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजने की तैयारियां चल रही हैं। हर ओर भक्ति, श्रद्धा और शक्ति की आराधना का वातावरण है। मां दुर्गा के सामने शीश झुकाकर लोग सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं। लेकिन इसी भक्तिमय माहौल के बीच एक सवाल दिल को झकझोरता है- जिस समाज में बेटियों को देवी मानकर पूजा जाता है, उसी समाज में उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता क्यों बनी हुई है?
यह सवाल किसी एक घर, गांव या शहर का नहीं, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा से जुड़ा है। नवरात्र के नौ दिनों में हम नारी शक्ति का गुणगान करते हैं, लेकिन क्या हमारा व्यवहार भी उस सम्मान की गवाही देता है, जिसकी हम देवी के सामने कामना करते हैं?
माथे पर तिलक, हाथों में पूजा की थाली, फिर बेटी की सुरक्षा की चिंता क्यों?
नवरात्र हमें सिखाता है कि नारी शक्ति है, साहस है और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक है। मां दुर्गा की आराधना करते समय हम बुराई पर अच्छाई की जीत की कामना करते हैं। मगर समाज की एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि अनेक परिवारों में बेटियों के घर से बाहर निकलने पर चिंता बनी रहती है। उनकी पढ़ाई, नौकरी, यात्रा और स्वतंत्रता के साथ सुरक्षा का सवाल जुड़ा रहता है।
एक बेटी जब अपने सपनों की उड़ान भरना चाहती है, तो क्या उसे भी उतनी ही स्वतंत्रता और सुरक्षा मिलती है, जितनी उसके भाई को? एक पिता अपनी बेटी को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते समय निश्चिंत क्यों नहीं हो पाता? एक मां अपनी बच्ची के घर लौटने तक बार-बार दरवाजे की ओर क्यों देखती है?
ये सवाल किसी को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच को बदलने के लिए हैं, जिसमें बेटियों को सुरक्षा का भरोसा देने के बजाय उनसे ही सावधान रहने की अपेक्षा की जाती है।
आखिर कब वह दिन आएगा, जब किसी बेटी की पहचान उसके डर से नहीं, बल्कि उसके सपनों और उपलब्धियों से होगी?
कन्या पूजन से आगे बढ़कर बेटियों के सम्मान की जरूरत
नवरात्र में कन्या पूजन हमारी आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। छोटी-छोटी बच्चियों के पैर धोए जाते हैं, उन्हें भोजन कराया जाता है और देवी का स्वरूप मानकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। लेकिन मन को यह सवाल भी मथता है कि जिस बच्ची के सामने हम श्रद्धा से सिर झुकाते हैं, क्या उसके बड़े होने पर भी उसके सम्मान, अधिकार और स्वतंत्रता की रक्षा कर पाएंगे?
बेटी को देवी कहना आसान है, लेकिन उसके विचारों को स्वीकार करना, उसकी इच्छाओं का सम्मान करना और उसे अपने फैसले लेने का अधिकार देना कहीं अधिक जरूरी है। उसे पढ़ने, आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए। उसके साथ किसी तरह का दुर्व्यवहार हो, तो उसकी आवाज दबाने के बजाय उसे न्याय दिलाने के लिए समाज को आगे आना चाहिए।
बेटियों को पूजा के समय देवी और जीवन में बोझ समझने वाली सोच बदले बिना नारी सम्मान की कल्पना अधूरी है।
बेटी की चुप्पी नहीं, समाज की आवाज बननी चाहिए
बेटियों की सुरक्षा केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं है। यह परिवार, समाज, शिक्षण संस्थानों और प्रशासन की सामूहिक जवाबदेही है। बच्चों को बचपन से ही महिलाओं के प्रति सम्मान, समानता और संवेदनशीलता का संस्कार देना होगा। महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न को सामान्य मानने या उस पर चुप्पी साधने की प्रवृत्ति का विरोध करना होगा।
जब किसी बेटी के साथ अन्याय हो, तो समाज को उसके चरित्र पर सवाल उठाने के बजाय उसके साथ खड़ा होना चाहिए। शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए, दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई हो और पीड़ित को न्याय मिले। बेटियों को यह भरोसा होना चाहिए कि संकट की घड़ी में वे अकेली नहीं हैं।
क्योंकि जिस समाज में गलत के विरुद्ध आवाज उठाने वालों को समर्थन मिलता है, वहां बदलाव की उम्मीद मजबूत होती है।
इस नवरात्र देवी से आशीर्वाद ही नहीं, अपने भीतर बदलाव का संकल्प भी लें
नवरात्र केवल दीप जलाने, आरती करने और मां दुर्गा के जयकारे लगाने का पर्व नहीं है। यह अपने भीतर की बुराइयों को पहचानने और उन्हें समाप्त करने का अवसर भी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूप हमें साहस, धैर्य, करुणा और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देते हैं।
इस बार मां के दरबार में केवल सुख-समृद्धि की कामना न करें, बल्कि ऐसा समाज बनाने का संकल्प भी लें, जहां किसी बेटी को अपनी सुरक्षा के लिए डर के साये में न जीना पड़े। जहां उसके सपनों पर पहरे न हों, उसकी आवाज को दबाया न जाए और उसके सम्मान से कोई समझौता न हो।
याद रखिए, मंदिर में जलता दीपक तभी सार्थक है, जब हमारे विचारों का अंधेरा भी दूर हो। देवी की प्रतिमा के सामने झुकने वाला सिर तभी सच्ची श्रद्धा का प्रतीक बनेगा, जब वही सिर किसी बेटी के सम्मान की रक्षा के लिए उठेगा।
नवरात्र की असली सार्थकता नौ दिनों की पूजा में नहीं, बल्कि पूरे साल बेटियों को मिलने वाले सम्मान और सुरक्षा में है।
क्योंकि मां दुर्गा की आराधना तभी पूर्ण होगी, जब हर बेटी सुरक्षित होगी, हर बहन सम्मानित होगी और हर महिला बिना भय के अपने सपनों को जी सकेगी।
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