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छठियारी से श्राद्ध तक सिमटी राजनीति, जनता के असली मुद्दे आज भी हाशिये पर : आलोक सोनी

Published: Jul 1, 2026 10:40 AM  •  Updated: Jul 1, 2026 10:40 AM
HIGHLIGHTS
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युवा सामाजिक कार्यकर्ता आलोक सोनी ने क्षेत्र की मौजूदा राजनीति और विकास कार्यों को लेकर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि आज की राजनीति जनसमस्याओं के समाधान से ज्यादा छठियारी, शादी-विवाह और श्राद्ध जैसे सामाजिक आयोजनों तक सीमित होकर रह गई है।

चौपारण (हजारीबाग)। प्रखंड के बसरिया पंचायत के युवा आलोक सोनी विकास के प्रति नाराजगी जताते हुए बताया कि आज की राजनीति छठियारी, विवाह-पार्टी और श्राद्धशोक में सिर्फ जाने वाले ही आज जनता के सबसे बड़े हमदर्द बन बैठे हैं। चाहे पक्ष की कुर्सी पर बैठा हमारा मसीहा हो या विपक्ष से टर-टर्रा रहा कोई बरसाती मेढ़क, हमारे भाग्य के भगवानमंडली यानी विधानसभा तक यही राजनीति दिखाई देती है। किसी का दुर्भाग्य से जन्म ले लेना, किसी का रिश्तेदारों के दबाव में शादी कर लेना, किसी का परलोकगमन कर जाना। बस यही जनप्रतिनिधियों के कृत्रिम जनसंपर्क और अवसरवादी संवेदनाओं का सबसे उपयुक्त उत्सव बन चुका है। जहाँ भीड़ होगी, चमचमाती कुर्सी होगी, फोन का कैमरा होगा, फोटो होगी, व्हाट्सअप-फेसबुक पोस्ट होगी। लेकिन जहाँ सच में जनता को जरूरत होगी, वहाँ अक्सर यही लोग गायब नजर आते हैं। पंचायत से लेकर प्रखण्ड और अनुमंडल स्तर तक समस्याओं का ढेर है। ब्लॉक में खुलेआम दलालतंत्र चल रहा है। अक्षत के साथ बिना दक्षणा चुमाए आम आदमी का काम होना मुश्किल हो गया है। हालत ऐसी हो चुकी है कि कई बार लोगों को अपनी आवाज सुनाने के लिए टावर तक पर चढ़ना पड़ता है। वरना गरीब आदमी महीनों कार्यालयों का चक्कर लगाता रहता है। गरीबों के राशन तक में कटौती हो रही है। तराजू में छर्री-इंटा रख के डीलरों द्वारा लाभार्थी से 2 किलो तक अनाज काट लिया जाता है। गरीब आदमी कुछ बोल भी नहीं पाता, उसे पता है कि यहाँ राशन से ज्यादा उसकी मजबूरी तौली जाती है। लेकिन इन मुद्दों पर उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी किसी भोज या कार्यक्रम में कौन नेता पहुँचा, इस पर होती है। सड़कों पर जगह-जगह गड्ढे हैं। नाले टूटे पड़े हैं। बाजारों में अतिक्रमण इस कदर बढ़ चुका है कि दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। बिजली और पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है। गर्मियों में घंटों बिजली गायब रहती है और जवाब मिलता है “मेंटेनेंस का कार्य प्रगति पर है।” यह प्रगति कहाँ जा रही है, शायद विभाग खुद भी नहीं जानता। इतने वर्षों से मेंटेनेंस गति में है कि जनता को लगने लगा है शायद तार नहीं, पूरा विभाग ही मरम्मत में चला गया है। विद्यालयों में शिक्षकों का अभाव है। लेकिन कई जगह प्रबन्ध समितियों का शिक्षा से ज्यादा ध्यान अंडा-भात व्यवस्था और फंड की ठेकेदारी पर दिखाई देता है। बच्चों की पढ़ाई पीछे छूट जाती है। सामुदायिक अस्पतालों की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। दवाओं की अनुपलब्धता पुरानी परंपरा बन चुकी है। मरीज इलाज कराने जाएँ तो अधिकांश को इतनी तेजी से रेफर कर दिया जाता है मानो अस्पताल नहीं, ट्रांजिट स्टेशन हो। लेकिन इन तमाम समस्याओं को नजरअंदाज करके हमारी राजनीति केवल छठियारी, विवाह-पार्टी और मृत्युशोक तक सिमटती जा रही है। विकास के नाम पर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं, लेकिन जमीन पर जनता आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम भी कई बार इन्हीं चीजों से प्रभावित होकर उन्हें चुन लेते हैं। लोकतंत्र में जनता जैसी राजनीति चाहती है, धीरे-धीरे वैसी ही राजनीति खड़ी हो जाती है। जिस दिन जनता दिखावे से ज्यादा काम को महत्व देगी, उसी दिन शायद छठियारी वाली राजनीति से आगे बढ़कर विकास की राजनीति शुरू होगी।

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