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लौह नगरी की पहचान बचाने के लिए जूझते कारीगर

Published: Apr 29, 2026 8:15 PM  •  Updated: Apr 29, 2026 8:15 PM
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क्राफ्ट समाचार/सुधांशु शेखर

देवघर। जिले के पतारडीह गांव में कभी सुबह की शुरुआत हथौड़ों की टक-टक से होती थी, जो यहां की पहचान बन चुकी थी। यह गांव ‘लौह नगरी’ के नाम से प्रसिद्ध था, जहां से रोज़ हजारों किलो लोहे के सामान देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजे जाते थे।

लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। मशीनों से बने सस्ते उत्पादों ने पारंपरिक लोहारों के काम को बुरी तरह प्रभावित किया है। आज स्थिति यह है कि जहां पहले भारी मात्रा में उत्पादन होता था, वहीं अब 100 से 200 किलो सामान की बिक्री भी मुश्किल हो गई है। गांव के लोहार परिवार आज भी अपने पूर्वजों के इस हुनर को बचाने में लगे हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि उनकी पहचान है। हालांकि बाजार, पूंजी और सरकारी सहयोग की कमी के कारण कई परिवारों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना का लाभ सीमित लोगों तक ही पहुंच पाया है, जबकि अधिकांश कारीगर अब भी मदद के इंतजार में हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि उन्हें आर्थिक सहायता, आधुनिक उपकरण और बाजार से सीधा जुड़ाव मिले, तो पतारडीह की ‘लौह नगरी’ की पहचान को फिर से जीवित किया जा सकता है। आज भी गांव में गूंजती हथौड़ों की आवाज़ यह बताती है कि संघर्ष जारी है और उम्मीद अभी बाकी है।

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