हमें किसी नेता की बैसाखी नहीं चाहिए, विस्थापित अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे, 116 गांवों के 19 हजार परिवारों ने नेताओं को दिया कड़ा संदेश
सरायकेला। चांडिल बांध विस्थापितों का आक्रोश अब खुलकर सामने आने लगा है। विस्थापितों ने सीधे उन राजनेताओं पर निशाना साधा है, जिनके हाथों में पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान जल संसाधन विभाग की कमान रही है। विस्थापितों का कहना है कि झारखंड में यह महत्वपूर्ण विभाग लंबे समय तक आजसू पार्टी के कोटे में रहा, इसके बावजूद विस्थापितों की दशकों पुरानी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। विस्थापितों ने दोटूक नारा बुलंद किया है “पहले हिसाब, फिर आंदोलन! पहले अधिकार, फिर राजनीति।”
चांडिल डैम से प्रभावित 116 गांवों के लगभग 19 हजार परिवारों ने एकजुट होकर राजनीतिक दलों को कड़ा संदेश दिया है कि वे केवल भाषणबाजी और वोट बैंक की राजनीति के मोहरे नहीं बनेंगे।
विस्थापितों का सवाल है कि अक्टूबर 2010 से जनवरी 2013 तक जब सुदेश कुमार महतो, अर्जुन मुंडा सरकार में उपमुख्यमंत्री और जल संसाधन विभाग के मंत्री थे, तब कितने विस्थापित परिवारों को पुनर्वास नीति का पूरा लाभ मिला? कितनों को मुआवजा मिला और कितने आज भी भटक रहे हैं?
चंद्रप्रकाश चौधरी जी, 4 साल की उपलब्धि बताइए!
फरवरी 2015 से जून 2019 तक चंद्रप्रकाश चौधरी रघुवर दास सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे। उनके लगभग साढ़े चार साल के कार्यकाल में चांडिल विस्थापितों के लिए क्या ठोस कदम उठे? कितने परिवारों का पुनर्वास पूरा हुआ? विस्थापितों को आंकड़ों के साथ जवाब चाहिए, भाषण नहीं।
जुगसलाई के पूर्व विधायक रामचंद्र सहिस ने जून 2019 में जल संसाधन मंत्री का पदभार संभाला था। उनके कार्यकाल में चांडिल बांध से प्रभावित 116 गांवों के 19,115 परिवारों को विस्थापित के रूप में चिह्नित करने और पुनर्वास नीति 2012 के तहत 14,400 परिवारों को विकास पुस्तिका जारी करने की बात सामने आई थी।
विस्थापितों का सवाल है कि जब मंत्री पद आपके पास था, तो लंबित समस्याओं के लिए कौन से ठोस कदम उठाए? कितनों को अधिकार मिला और कितने आज भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं?

आज आंदोलन की याद क्यों?
विस्थापितों ने कहा कि जब ईचागढ़ में आजसू के जनाधार को लेकर चर्चाएं हो रही हैं, तब विस्थापितों के मुद्दे पर आंदोलन की बात करना कई सवाल खड़े करता है। जब सत्ता थी, विभाग था, फैसले लेने का अवसर था, तब स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ?
हमें किसी नेता की बैसाखी नहीं चाहिए
विस्थापितों ने स्पष्ट कहा : हमें न हरलाल महतो की जरूरत है, न सविता महतो की और न ही रामचंद्र सहिस की राजनीतिक बैसाखी की। चांडिल के विस्थापित कोई राजनीतिक मोहरा नहीं हैं। वे अपने अधिकारों के लिए दशकों से लड़ रहे हैं। हम अपनी लड़ाई खुद लड़ने में सक्षम हैं।
उन्होंने कहा कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि अधिकारों की अनदेखी करने वाली व्यवस्था के खिलाफ है। जो ईमानदारी से खड़ा होगा उसका स्वागत है, लेकिन जो सत्ता में हिसाब नहीं देता और बाद में राजनीति करता है, उससे सवाल पूछा जाएगा।
कड़ा संदेश : विस्थापितों के बीच आकर सिर्फ भाषण नहीं चलेगा। अपने कार्यकाल के फैसलों का हिसाब देना होगा। चांडिल के विस्थापित किसी के वोट बैंक नहीं, अपने हक के असली दावेदार हैं। हम अपना हक मांगेंगे, अपना संघर्ष खुद लड़ेंगे।
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