सदियों पुरानी लोक परंपरा और जनजातीय पूजा पद्धति ने बनाई अलग पहचान, रविवार को नहीं होती पूजा-अर्चना
चतरा। झारखंड के चतरा और लातेहार जिले की सीमा से सटे सोलगी गांव में स्थित चटनियां बाबा का प्राचीन धार्मिक स्थल लोक आस्था और जनजातीय परंपराओं का अनूठा केंद्र है। घने जंगलों, चारों ओर फैली हरियाली और मनोरम प्राकृतिक वादियों के बीच स्थित इस स्थल पर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मिट्टी के हाथी-घोड़े चढ़ाते हैं।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाए जाते हैं मिट्टी के हाथी-घोड़े
चटनियां बाबा के दरबार की सबसे खास परंपरा मिट्टी से बने हाथी और घोड़े अर्पित करना है। मंदिर परिसर में रखे सैकड़ों मिट्टी के हाथी-घोड़े श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास की कहानी बयां करते हैं। मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने के बाद श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इन प्रतीकात्मक प्रतिमाओं को अर्पित करते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है।
पशुओं और परिवार की रक्षा करने वाले देवता की मान्यता
स्थानीय लोगों के अनुसार, चटनियां गोसाईं को क्षेत्र के गांवों, पशुओं, घर-परिवार और समाज की रक्षा करने वाले लोकदेवता के रूप में माना जाता है। इसी विश्वास के कारण चतरा के अलावा हजारीबाग, लातेहार, गुमला, कोडरमा, पलामू और बिहार के गया सहित आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

मनोकामना पूरी होने पर कुछ श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार बकरा और मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं, जबकि वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले लोग जनेऊ और चावल अर्पित करते हैं। पूजा की इन विविध परंपराओं में स्थानीय संस्कृति और लोगों की धार्मिक मान्यताओं की झलक दिखाई देती है।
जनजातीय परंपरा से होती है पूजा-अर्चना
चटनियां बाबा के इस प्राचीन स्थल की एक प्रमुख विशेषता यहां की पारंपरिक पूजा पद्धति है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, गांव के पाहन यानी पारंपरिक पुजारी पूजा-अर्चना संपन्न कराते हैं। यहां की पूजा विधि में जनजातीय संस्कृति और लोक परंपराओं का विशेष महत्व है।

एक और खास बात यह है कि स्थानीय मान्यता के अनुसार रविवार को यहां पूजा-अर्चना नहीं की जाती। इस परंपरा का आज भी पालन किया जाता है।
आस्था के साथ प्रकृति का भी अनूठा संगम
घने जंगलों और शांत प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित चटनियां बाबा का स्थल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक सुकून प्रदान करता है। यहां की प्राचीन मान्यताएं, मिट्टी के हाथी-घोड़े चढ़ाने की परंपरा और जनजातीय पूजा पद्धति झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।
चटनियां बाबा का दरबार आज भी लोकविश्वास और परंपराओं को संजोए हुए है। यहां स्थापित मिट्टी के हाथी-घोड़े केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और सांस्कृतिक पहचान के भी प्रतीक हैं।







