कोलकाता की निषिद्ध पल्ली से मिट्टी लाने की परंपरा 2008 से कायम, मिट्टी अर्पित करने वाली महिलाओं को वस्त्र और उपहार देकर किया जाता है सम्मानित
विष्णुगढ़ (हजारीबाग) / राजेश दुबे। आस्था का असली अर्थ तभी सार्थक होता है, जब वह सामाजिक भेदभाव की दीवारों को तोड़कर इंसानियत, सम्मान और समानता का संदेश दे। धर्म की इसी भावना को साकार करती है विष्णुगढ़ प्रखंड के सात मील मोड़ स्थित रमुआ सार्वजनिक दुर्गा मंदिर की अनूठी परंपरा। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा निर्माण के लिए कोलकाता की निषिद्ध पल्ली यानी वेश्यालय क्षेत्र से मिट्टी लाई जाती है। वर्ष 2008 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है। मां की प्रतिमा निर्माण से जुड़ी यह पहल धार्मिक आस्था के साथ समाज के उस वर्ग के प्रति सम्मान का भाव भी व्यक्त करती है, जिसे अक्सर सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।

जहां समाज की नजरें ठहरती नहीं, वहां सम्मान से झुकते हैं सिर
रमुआ की दुर्गा पूजा की यह परंपरा केवल मिट्टी लाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर मानवीय संवेदना और सामाजिक समरसता का संदेश समेटे हुए है। रमुआ सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति के सदस्य हर वर्ष मां दुर्गा की प्रतिमा की साज-सज्जा और पूजा सामग्री की खरीदारी के सिलसिले में कोलकाता जाते हैं। इसी दौरान वे निषिद्ध पल्ली पहुंचते हैं और वहां की महिलाओं से मां की प्रतिमा निर्माण के लिए मिट्टी देने का आग्रह करते हैं।
यह आग्रह किसी औपचारिकता की तरह नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के भाव से किया जाता है। समिति के सदस्य पहले महिलाओं से विनम्रतापूर्वक मिट्टी देने की अनुमति मांगते हैं। उनकी सहमति मिलने पर अगले दिन निर्धारित समय पर दोबारा पहुंचते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं की सहमति और उनके सम्मान को महत्व दिया जाता है।
मिट्टी के साथ सम्मान और आत्मीयता का उपहार
परंपरा के अनुसार, मिट्टी अर्पित करने वाली महिला को सगुन के रूप में नए वस्त्र, शॉल और उपहार भेंट किए जाते हैं। समिति के सदस्य उनके सामने सम्मानपूर्वक सिर झुकाकर खड़े रहते हैं। इसके बाद महिला स्वयं आगे बढ़कर अपनी झोली से मिट्टी अर्पित करती हैं। इस तरह मिट्टी प्राप्त करने की प्रक्रिया को श्रद्धा, विनम्रता और आत्मीयता से जोड़ा गया है।
इस परंपरा का सबसे भावुक पक्ष यही है कि यहां किसी महिला की सामाजिक पहचान या परिस्थिति को उसके सम्मान के आड़े नहीं आने दिया जाता। मां दुर्गा की प्रतिमा निर्माण के लिए मिट्टी मांगने पहुंचने वाले समिति के सदस्य इस व्यवहार के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि मानवीय गरिमा हर व्यक्ति का अधिकार है।
मां दुर्गा की आराधना में सामाजिक समरसता का संदेश
मां दुर्गा को शक्ति, साहस और कल्याण की प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना में निषिद्ध पल्ली की मिट्टी का उपयोग इस विचार को सामने लाता है कि आस्था के दायरे में किसी के प्रति भेदभाव नहीं होना चाहिए। समाज के जिन लोगों को अक्सर उपेक्षा की नजर से देखा जाता है, उनके प्रति सम्मान का भाव रखना भी धार्मिक संवेदना का एक महत्वपूर्ण पक्ष है।
रमुआ की यह परंपरा समाज को सोचने का अवसर देती है कि किसी व्यक्ति का सम्मान उसकी सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसकी मानवीय गरिमा से जुड़ा होना चाहिए। मां दुर्गा की प्रतिमा गढ़ने के लिए मिट्टी जुटाने की यह पहल इसी भावना को अभिव्यक्त करती है।
वर्ष 2008 से कायम है परंपरा
सात मील मोड़ स्थित रमुआ सार्वजनिक दुर्गा मंदिर में वर्ष 2008 से निभाई जा रही यह परंपरा अब पूजा आयोजन की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। समय के साथ पूजा का स्वरूप भले ही विस्तृत हुआ हो, लेकिन निषिद्ध पल्ली से मिट्टी लाने की परंपरा का भाव आज भी कायम है।
रमुआ की दुर्गा पूजा यह संदेश देती है कि धर्म केवल पूजा-पाठ और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। उसका वास्तविक स्वरूप करुणा, समानता और सम्मान जैसे मानवीय मूल्यों में भी दिखाई देता है। मां दुर्गा की प्रतिमा में प्रयुक्त मिट्टी की यह परंपरा इसी विश्वास को जीवंत करती है कि आस्था की नजर में हर इंसान सम्मान का अधिकारी है और सच्ची पूजा वही है, जिसमें इंसानियत के लिए भी स्थान हो।








