36 घंटे के कठिन निर्जला उपवास और सूर्योपासना का चार दिवसीय महापर्व; पूर्व मुखिया पूर्णिमा देवी ने दी पर्व की विस्तृत जानकारी, सांसद व विधायक ने दी शुभकामनाएं
चौपारण (हजारीबाग)। लोक आस्था, सूर्योपासना और प्रकृति संरक्षण का प्रतीक महापर्व छठ पूजा इस वर्ष 13 नवंबर 2026 से श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ शुरू होगा। चार दिनों तक चलने वाला यह पवित्र पर्व 16 नवंबर को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ संपन्न होगा। छठ महापर्व में व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए लगभग 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं। इस दौरान भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना की जाती है।
उक्त बातें लंबे समय से छठ मैया की उपासक एवं ग्राम पंचायत झापा की पूर्व मुखिया पूर्णिमा देवी ने एक गोष्ठी के दौरान कही। उन्होंने छठ महापर्व के धार्मिक महत्व, परंपराओं और चार दिनों तक चलने वाले अनुष्ठानों की विस्तृत जानकारी साझा की।
पूर्णिमा देवी ने बताया कि 13 नवंबर, शुक्रवार को नहाय-खाय के साथ महापर्व का शुभारंभ होगा। इस दिन व्रती पवित्र स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करेंगे। वहीं, 14 नवंबर, शनिवार को खरना का अनुष्ठान होगा। खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती लगभग 36 घंटे के निर्जला व्रत का संकल्प लेते हैं।
15 नवंबर, रविवार को संध्या अर्घ्य के दौरान अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। वहीं, 16 नवंबर, सोमवार को प्रातःकालीन अर्घ्य के साथ छठ महापर्व का समापन होगा।
उन्होंने चार दिवसीय छठ पूजा की परंपराओं को विस्तार से बताते हुए कहा कि इस महापर्व का प्रत्येक दिन विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है।
पहला दिन : नहाय-खाय (13 नवंबर)
छठ महापर्व की शुरुआत स्वच्छता और आत्मशुद्धि के संकल्प के साथ होती है। इस दिन व्रती पवित्र नदी, तालाब या अन्य जलाशयों में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं। घर-आंगन की साफ-सफाई की जाती है। इसके बाद अरवा चावल, चने की दाल और लौकी की सब्जी सहित सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। सबसे पहले व्रती भोजन ग्रहण करते हैं, उसके बाद परिवार के अन्य सदस्य प्रसाद स्वरूप भोजन करते हैं।
दूसरा दिन : खरना (14 नवंबर)
खरना के दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं। शाम को मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से गुड़, दूध और चावल से खीर तथा गेहूं की रोटी तैयार की जाती है। भगवान सूर्य और छठी मैया को भोग अर्पित करने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं। खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद लगभग 36 घंटे के निर्जला उपवास की शुरुआत होती है।
तीसरा दिन : संध्या अर्घ्य (15 नवंबर)
महापर्व के तीसरे दिन घरों में छठ का पारंपरिक प्रसाद ठेकुआ और कसार तैयार किया जाता है। इसके साथ ही फल, नारियल और अन्य पूजन सामग्री को बांस के सूप एवं दौरा में सजाया जाता है। व्रती और श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ छठ घाट पहुंचते हैं। अस्ताचलगामी सूर्य को जल और दूध से अर्घ्य अर्पित कर परिवार तथा समाज की मंगलकामना करते हैं। इस दौरान घाटों पर भक्ति और आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है।

चौथा दिन : उषा अर्घ्य एवं पारण (16 नवंबर)
महापर्व के अंतिम दिन श्रद्धालु अहले सुबह छठ घाटों पर पहुंचते हैं और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसके बाद व्रती पूजा-अर्चना कर घर लौटते हैं और पारण के साथ अपना कठिन व्रत पूरा करते हैं। इसी के साथ चार दिवसीय छठ महापर्व का विधिवत समापन हो जाता है।
पूर्णिमा देवी ने कहा कि छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्वच्छता, अनुशासन, प्रकृति प्रेम, सामाजिक एकता और लोक संस्कृति का अनूठा संदेश देने वाला महापर्व है। इस पर्व में जाति और वर्ग से ऊपर उठकर सभी लोग एक साथ छठ घाटों की सफाई और व्यवस्था में सहयोग करते हैं।
छठ महापर्व के अवसर पर शुभकामनाएं
इस पावन अवसर पर हजारीबाग के लोकप्रिय सांसद मनीष जायसवाल, बरही के विधायक मनोज कुमार यादव, बरही विधानसभा के सांसद प्रतिनिधि मुकुंद साव एवं ग्राम पंचायत झापा की पूर्व मुखिया पूर्णिमा देवी ने समस्त सनातन धर्मावलंबियों को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।








