—आलोक सोनी
देखिए, सच कहें तो, सबसे कड़वी और शर्मनाक बात यह है कि हममें से ज़्यादातर लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ तब बोलते हैं, जब हम खुद उसमें हिस्सा नहीं ले पाते। जब अपना काम पैसे या जुगाड़ से नहीं बनता, तब अचानक हमें ईमानदारी और न्याय याद आने लगता है। वरना मौका मिले तो वही काम हम भी कर लेते हैं। यही असली सच्चाई है, जिसे हम मानना नहीं चाहते।
बात सत्ताधीशों की करें तो यदि वे सच में चाहें, तो बहुत हद तक इस पर लगाम लगा सकते हैं। कानून भी है, ताकत भी है। लेकिन वो ऐसा करेंगे क्यों ? उन्हें भी पता है कि बड़े उद्योगपति, व्यापारी उनके चुनावी फाइनेन्सर हैं। पैसा वही लोग देते हैं, सपोर्ट वही देते हैं। बदले में उन्हें थोड़ी ढील, थोड़ा फायदा, थोड़ा मैनेजमेंट चाहिए। ये एक तरह का समझौता है, जो सबको दिखता भी है और कोई खुलकर मानता भी नहीं। सियासतदां भी ये रिश्ता नहीं तोड़ना चाहते, क्योंकि इससे उनकी कुर्सी हिल सकती है। और जो बड़े लोग हैं, वो भी नहीं चाहेंगे कि भ्रष्टाचार खत्म हो, क्योंकि इसका सीधा फायदा इन्हीं के पक्ष में होता है।
अब बचें हम जैसे आम लोग। हम क्या करते हैं ? चाय की दुकान पर, दोस्तों के बीच, सोशल मीडिया पर भ्रष्टाचार के खिलाफ खूब बात करेंगे। गुस्सा भी दिखेगा, निराशा भी। लेकिन जब सच में खड़े होने की बात आएगी तो हम पीछे हट जाएंगे। और दिमाग में सिर्फ यही चलेगा कि डर लगता है, या लगता है कि “अकेले क्या कर लेंगे ?” और धीरे-धीरे ये विरोध सिर्फ बातों तक रह जाता है।
असल में भ्रष्टाचार का निदान चुनाव के वक्त नेताओं के मेनिफेस्टो (चुनावी मुद्दा) में केवल उम्मीद बनकर ही रह जाता है। जिसका हर 5 वर्ष के बाद हम केवल मुंह दिखाई करते हैं। भ्रष्टाचार हम जैसे आम लोगों के हक और अधिकार के बीच खड़ा एक बैरियर है। बैरियर के उस पार पूंजीपति और उद्योगपति बैठे हैं, जो रोज़ हमारे हिस्से की थाली में छौंका लगाकर मज़े से खा रहे हैं। और इस पार खड़े हम जैसे आम लोग, जिनके हिस्से में बस भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं की छोड़ी हुई खुशबू ही आती है, और हमें उसी में पेट भरने का नाटक करना पड़ता है।
भ्रष्टाचार सिर्फ नेताओं की वजह से नहीं है, और सिर्फ जनता की वजह से भी नहीं। ये एक पूरा चक्र है, जिसमें ऊपर वाले भी शामिल हैं और हम जैसे नीचे वाले भी। जब तक ये सोच नहीं बदलेगी कि “मुझे फायदा हो रहा है तो ठीक है”, तब तक कुछ भी बदलना मुश्किल है।
—आलोक सोनी