भारत एक तरफ आर्थिक रफ्तार के नए आयाम छू रहा है, तो दूसरी तरफ असमानता और जलवायु परिवर्तन के रूप में दो बड़े संकट सिर उठा रहे हैं. विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट और 2026 लांसेट काउंटडाउन ग्लोबल रिपोर्ट’ ने देश के सामने खड़े इन दो गंभीर मोर्चों की पोल खोल दी है, जहां एक ओर गरीबों की थाली तक पहुंच आसान हुई है, तो वहीं दूसरी ओर भीषण गर्मी देश की अर्थव्यवस्था और सेहत दोनों को दीमक की तरह चाट रही है. रिर्पोट के अनुसार देश में 3.5 करोड़ लोग रोज 300 रुपये से कम पर गुजारा कर रहे हैं.
अमीरी और गरीबी की बढ़ती खाई
विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अत्यधिक गरीबी में भारी गिरावट आई है और 2023 में यह मात्र 2.6% रह गई है. इसके बावजूद, देश में धन का असमान वितरण एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है. साल 2023 में देश के सबसे ज्यादा कमाने वाले 10% लोगों की औसत कमाई, सबसे कम कमाने वाले 10% लोगों से करीब 13 गुना अधिक थी. भले ही पिछले कुछ वर्षों में रोजगार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश काम कम उत्पादकता वाले हैं, जिससे मेहनतकश वर्ग की वास्तविक आय में कोई खास सुधार नहीं हुआ है. स्थिति यह है कि शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में गरीबी आज भी दोगुने से ज्यादा है. उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले पट्टी में देश के करीब 57% गरीब निवास करते हैं, जिन्हें मुख्यधारा से जोड़ना अभी भी एक बड़ी चुनौती है.
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग का कहर
दूसरी तरफ, ग्लोबल वॉर्मिंग अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि इंसानी सेहत और अर्थव्यवस्था के लिए लाइलाज नासूर बनता जा रहा है. लांसेट की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भीषण गर्मी और जलवायु संकट के कारण भारत को अपनी जीडीपी का 4.2 प्रतिशत यानी करीब 174 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 16,541 अरब रुपये) का करारा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है.






