सालभर की कमजोर आमदनी के बीच दीपावली का सीजन बना कमाई का बड़ा सहारा, आधुनिक मशीन और सरकारी मदद की आस में कई कारीगर
फतेहपुर (जामताड़ा) / शेख शमीम। दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही फतेहपुर प्रखंड के करजोड़ी गांव में मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार परिवारों की जिंदगी में व्यस्तता बढ़ गई है। गांव की गलियों में इन दिनों मिट्टी को आकार देने की हलचल तेज है। कहीं मिट्टी तैयार की जा रही है, तो कहीं कारीगर अपने हुनर से एक के बाद एक दीये बना रहे हैं। परिवार के छोटे-बड़े सदस्य इस मौसमी काम में जुटे हैं। मकसद है कि दीपावली के बाजार में मिट्टी के दीये बेचकर कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सके और त्योहार की खुशियों के साथ घर की आर्थिक जरूरतें भी पूरी हो सकें।

करजोड़ी गांव के कुम्हारों के लिए दीपावली महज एक त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत और इंतजार के बाद मिलने वाला कमाई का अहम अवसर है। कारीगरों का कहना है कि पारंपरिक कुम्हारी के काम से पूरे साल पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती। दीपावली के आसपास ही मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ती है और इसी दौरान परिवारों को कुछ बेहतर कमाई की उम्मीद रहती है। यही वजह है कि समय रहते अधिक से अधिक दीये तैयार करने के लिए कारीगर लगातार मेहनत कर रहे हैं।
मिट्टी के दीयों में छिपी है परिवारों की उम्मीद
बाजार में भले ही बिजली की झालरों और आधुनिक सजावटी सामानों की चमक बढ़ गई हो, लेकिन मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान और धार्मिक महत्व है। दीपावली पर घरों और प्रतिष्ठानों को रोशन करने के लिए आज भी बड़ी संख्या में लोग मिट्टी के दीये खरीदते हैं। इसी मांग को देखते हुए करजोड़ी के कुम्हार पारंपरिक हुनर के सहारे बाजार में अपनी जगह बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
कारीगरों का कहना है कि दीये बनाने में मेहनत काफी लगती है, लेकिन इससे होने वाली आमदनी सीमित रहती है। यदि उन्हें आधुनिक मशीनें, बेहतर उपकरण और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। इससे वे अधिक ऑर्डर ले सकेंगे और उनकी कमाई में भी सुधार हो सकेगा।
पीएम विश्वकर्मा योजना से कुछ को लाभ, कई अब भी इंतजार में
कुम्हार समुदाय के कुछ कारीगरों को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत मशीन का लाभ मिला है। वहीं, कई अन्य कारीगरों का कहना है कि उन्हें अब तक मशीन मिलने से संबंधित कोई सूचना या संदेश नहीं मिला है। इससे योजना का लाभ सभी पात्र लोगों तक पहुंचने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कारीगर चाहते हैं कि संबंधित विभाग उनकी समस्याओं पर ध्यान दे और पात्र लाभुकों को योजना का लाभ दिलाने की दिशा में पहल करे।
पारंपरिक कला को बचाने के लिए सरकारी सहयोग जरूरी
करजोड़ी गांव के कुम्हारों का पारंपरिक हुनर आज भी जीवित है। पीढ़ियों से मिट्टी को आकार देकर दीये और अन्य सामान बनाने की कला इन परिवारों की पहचान रही है। लेकिन बदलते बाजार, आर्थिक चुनौतियों और आधुनिक सुविधाओं की कमी के कारण इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना आसान नहीं रह गया है। कारीगरों का मानना है कि उचित प्रशिक्षण, आधुनिक मशीन, आर्थिक सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो इस पारंपरिक रोजगार को नई दिशा मिल सकती है।
दीपावली के मौके पर जब घर-आंगन मिट्टी के दीयों से रोशन होंगे, तब उन दीयों के पीछे करजोड़ी के कुम्हार परिवारों की मेहनत भी शामिल होगी। फिलहाल ये परिवार अपने पारंपरिक हुनर के सहारे त्योहार के बाजार में बेहतर कमाई की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जरूरत इस बात की है कि इन कारीगरों की मेहनत को उचित बाजार और सरकारी योजनाओं का पूरा सहयोग मिले, ताकि मिट्टी के दीये बनाने की यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक कायम रह सके।
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