मुख्यमंत्री को लिखे कथित पत्र में पुलिस मुख्यालय पर अनदेखी का आरोप, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे जवानों के करीब 500 आवेदन लंबित होने का दावा
रांची। झारखंड पुलिस महकमे में डीजीपी को पद से हटाने की मांग और पुलिसकर्मियों की समस्याओं को लेकर कथित तौर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखे गए एक पत्र ने विवाद खड़ा कर दिया है। झारखंड पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष राहुल मुर्मू और महामंत्री संजीव कुमार के हस्ताक्षर वाले इस पत्र में पुलिस मुख्यालय पर कर्मियों की कल्याणकारी समस्याओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया था। हालांकि, खबर प्रकाशित होने के बाद एसोसिएशन के शीर्ष पदाधिकारियों ने पत्र को फर्जी बताते हुए ऐसा कोई पत्र लिखने से इनकार कर दिया। इस घटनाक्रम के बाद पत्र की प्रामाणिकता और एसोसिएशन के रुख को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

11 पत्र भेजने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का आरोप
कथित पत्र में उल्लेख किया गया था कि जून 2025 से जुलाई 2026 के बीच पुलिसकर्मियों की समस्याओं और कल्याणकारी कार्यों से संबंधित 11 पत्र पुलिस मुख्यालय को भेजे गए, लेकिन उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसमें गंभीर बीमारियों से पीड़ित पुलिसकर्मियों के आवेदनों पर भी निर्णय नहीं लिए जाने की बात कही गई थी। पत्र में डीजीपी तदाशा मिश्रा को पद से हटाने की मांग भी किए जाने का दावा है।
खबर प्रकाशित होने के बाद एसोसिएशन ने किया इनकार
मामले की खबर सामने आने के बाद एसोसिएशन के अध्यक्ष और महामंत्री ने बयान जारी कर कथित पत्र को फर्जी करार दिया और कहा कि संगठन की ओर से ऐसा कोई पत्र नहीं लिखा गया है। दूसरी ओर, उपलब्ध आंतरिक दस्तावेजों में पत्र पर पदाधिकारियों के हस्ताक्षर होने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और पत्र की प्रामाणिकता स्पष्ट किए जाने की मांग उठ सकती है।
गंभीर बीमारियों से पीड़ित पुलिसकर्मियों के आवेदन लंबित
पत्र में आरोप लगाया गया है कि शिकायत कोषांग की बैठक आयोजित करने के बजाय पुलिस मुख्यालय स्तर पर बार-बार कमेटियों का गठन किया जा रहा है, लेकिन बैठक की तारीख तय नहीं होती। इसके कारण हृदय, किडनी और अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित पुलिस पदाधिकारियों के लगभग 500 आवेदन लंबित होने का दावा किया गया है। बीमारी के आधार पर स्थानांतरण की मांग करने वाले कर्मियों को राहत नहीं मिलने से उनकी परेशानियां बढ़ने की बात भी कही गई है।
सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचे कर्मियों की पोस्टिंग पर सवाल
कथित पत्र के अनुसार, सेवानिवृत्ति में दो वर्ष या उससे कम समय शेष रहने वाले पुलिस पदाधिकारियों को गृह जिले अथवा उनके इच्छित जिले में पदस्थापित करने का प्रावधान है। इसके बावजूद कई कर्मियों को स्थानांतरण का इंतजार करते-करते सेवानिवृत्त होना पड़ा, जबकि कुछ अन्य कर्मियों की सेवानिवृत्ति निकट है। पत्र में इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठाए गए हैं।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय से तैनाती का मुद्दा
पत्र में पश्चिमी सिंहभूम, चाईबासा, लातेहार, गढ़वा और पलामू जैसे क्षेत्रों में दस वर्ष से अधिक समय से तैनात पुलिस पदाधिकारियों की स्थिति का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि लंबे समय तक एक ही जिले या इकाई में तैनाती के कारण पुलिसकर्मियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पत्र में मलेरिया, ब्रेन मलेरिया और अवसाद जैसी समस्याओं का जिक्र करते हुए स्थानांतरण की प्रक्रिया तेज करने की जरूरत बताई गई है।
इसके अलावा, सब-इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर पद पर प्रोन्नति के लंबित मामलों को भी पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली से जुड़ी समस्या के रूप में उठाया गया है।
श्रावणी मेला ड्यूटी के दौरान सामने आया असंतोष
कथित पत्र में कहा गया है कि एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने 4 से 8 अगस्त 2026 तक श्रावणी मेला ड्यूटी के दौरान देवघर, दुमका और रेल धनबाद में तैनात पुलिस पदाधिकारियों से मुलाकात की थी। इस दौरान कर्मियों की समस्याओं का लंबे समय से समाधान नहीं होने के कारण पुलिस मुख्यालय के प्रति असंतोष बढ़ने की बात सामने आने का दावा किया गया।
पूरे मामले में पारदर्शिता की जरूरत
डीजीपी को हटाने की मांग से जुड़े कथित पत्र और उसके बाद एसोसिएशन के इनकार ने पूरे घटनाक्रम को चर्चा का विषय बना दिया है। एक ओर पत्र में पुलिसकर्मियों की समस्याओं, लंबित स्थानांतरण और प्रोन्नति जैसे मुद्दे उठाए जाने की बात कही गई है, तो दूसरी ओर संगठन के पदाधिकारी इसे फर्जी बता रहे हैं। ऐसे में पत्र की प्रामाणिकता, उसके जारी होने की परिस्थितियों और पुलिसकर्मियों की शिकायतों पर हुई कार्रवाई को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।
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