चेचक की महामारी के बीच रामकिशुन दूबे ने लिया था पूजा शुरू करने का संकल्प, पीढ़ियों से महंथ घराना निभा रहा परंपरा
Hazaribagh News: विष्णुगढ़ संवाददाता राजेश दूबे। एक ओर चेचक की महामारी का कहर, दूसरी ओर जिंदगी और मौत के बीच जूझता बेटा। परिवार के सामने संकट था और पिता की आंखों में बेटे को खो देने का भय। ऐसे कठिन समय में रामकिशुन दूबे ने मां दुर्गा से मन्नत मांगी थी कि उनका बेटा स्वस्थ हो जाए और गांव से महामारी का प्रकोप समाप्त हो जाए, तो वे मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना शुरू कराएंगे। महंथ घराने की मान्यता के अनुसार, उनकी मन्नत पूरी हुई। इसके बाद वर्ष 1870 में विष्णुगढ़ प्रखंड के महंथ अखाड़ा चौक स्थित दुर्गा मंदिर में मां दुर्गा की पूजा शुरू हुई। एक पिता की पीड़ा और आस्था से शुरू हुई यह आराधना आज 156 वर्षों की परंपरा बन चुकी है। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन महंथ घराने की आस्था आज भी अडिग है।
बेटे की गंभीर हालत ने पिता को झकझोरा, मांगी थी मन्नत
महंथ घराने की इस ऐतिहासिक दुर्गा पूजा के पीछे एक भावुक प्रसंग जुड़ा है। परिवार की मान्यता के अनुसार, चेचक की महामारी के दौरान रामकिशुन दूबे के बड़े पुत्र महंथ बासुदेव दास भी बीमारी की चपेट में आ गए थे। उनकी हालत गंभीर हो गई थी और एक आंख की रोशनी भी चली गई थी। बेटे की बिगड़ती हालत ने रामकिशुन दूबे को भीतर तक झकझोर दिया। संकट की उस घड़ी में उन्होंने मां दुर्गा से पुत्र के स्वस्थ होने की प्रार्थना की और मन्नत मांगी कि बेटा स्वस्थ हो जाए तथा गांव महामारी से मुक्त हो जाए, तो वे मां की प्रतिमा स्थापित कर नियमित पूजा-अर्चना शुरू कराएंगे।
महंथ घराने की मान्यता है कि इसके बाद महंथ बासुदेव दास की जान बच गई और गांव से चेचक का प्रकोप भी समाप्त हो गया। रामकिशुन दूबे ने अपने संकल्प को पूरा करते हुए वर्ष 1870 में मां दुर्गा की पूजा शुरू कराई। इसी के साथ एक ऐसी धार्मिक परंपरा की नींव पड़ी, जो आज भी परिवार की पहचान बनी हुई है।

संकट की घड़ी में जन्मी आस्था बनी ऐतिहासिक विरासत
महंथ अखाड़ा चौक की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वजों के संकल्प और पारिवारिक आस्था की विरासत है। वर्ष 1870 में शुरू हुई पूजा आज 156 वर्ष बाद भी उसी श्रद्धाभाव के साथ जारी है। हर वर्ष दुर्गा पूजा के अवसर पर महंथ अखाड़ा चौक में मां दुर्गा की आराधना की जाती है। परिवार के लिए यह आयोजन पूर्वजों के संकल्प को याद करने और उनकी आस्था को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का अवसर है।
महंथ घराने के साथ दुकानदार भी निभाते हैं भागीदारी
इस दुर्गोत्सव की विशेषता यह है कि परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महंथ घराने के सदस्यों के साथ महंथ अखाड़ा चौक के दुकानदार भी सहयोग करते हैं। स्थानीय दुकानदारों की सहभागिता इस आयोजन को सामूहिक आस्था का स्वरूप देती है। परिवार और दुकानदारों के आपसी सहयोग से वर्षों पुरानी यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है।
महंथ घराने के राजेंद्र दूबे, रामकुमार दूबे, राजेश दूबे, राकेश कुमार दूबे, भास्कर दूबे, गौरव कुमार दूबे और सौरभ कुमार दूबे सहित अन्य सदस्य पूजा की तैयारियों और परंपराओं के निर्वहन में अपनी भूमिका निभाते हैं। परिवार के सदस्य इसे केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली धरोहर मानते हैं।
156 वर्षों से कायम है आस्था की डोर
महंथ अखाड़ा चौक की दुर्गा पूजा का इतिहास एक पिता की चिंता, बेटे के जीवन की कामना और मां दुर्गा के प्रति अटूट विश्वास से जुड़ा है। चेचक की महामारी के कठिन दौर में लिया गया संकल्प आज महंथ घराने की ऐतिहासिक पहचान बन चुका है। रामकिशुन दूबे ने जिस विश्वास के साथ पूजा की शुरुआत की थी, उनकी पीढ़ियां उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। एक पिता की मन्नत से शुरू हुई मां दुर्गा की आराधना 156 वर्षों बाद भी जारी है। यह परंपरा आस्था, संस्कार और पूर्वजों के संकल्प से जुड़ी विरासत को पीढ़ियों तक सहेजने की मिसाल है।
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