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धूल के गुबार में विश्व स्वास्थ्य दिवस और लाल पानी की नियति

Published: Apr 9, 2026 3:53 PM  •  Updated: Apr 9, 2026 3:53 PM
HIGHLIGHTS
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पश्चिमी सिंहभूम। पश्चिमी सिंहभूम की धरती अपनी कोख में बेशकीमती लौह अयस्क छिपाए बैठी है,लेकिन विडंबना देखिए कि इसी रत्नगर्भा की संतानों के फेफड़े धूल फांक रहे हैं। कल जब पूरी दुनिया विश्व स्वास्थ्य दिवस पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर स्वास्थ्य सबके लिए का नारा बुलंद कर रही होगी तब सारंडा और चाईबासा के खदान क्षेत्रों में एक नया डंपर धूल का एक नया मेकअप बच्चों के चेहरों पर पोत कर निकल जाएगा।

खदान क्षेत्रों में विकास की परिभाषा बड़ी अनोखी है। यहां हवा में ऑक्सीजन कम और आयरन के बारीक कण ज्यादा हैं। सड़कों की हालत ऐसी है कि धूल के गुबार में यह पता लगाना मुश्किल होता है कि सामने से कोई इंसान आ रहा है या चलता-फिरता लाल मिट्टी का पुतला।कुल मिलाकर इस ज़िलें में धूल से हर फूल मुरझाया हुआ है।धूल प्रदूषण यहां आम आवाम की बड़ी परेशानी है।इस तरह का प्रदूषण यहां कई तरह की परेशानी का कारण है तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग की फाइलें कहती हैं कि हम धूल प्रदूषण रोग से लड़ने को तैयार हैं,जबकी धरातल की सच्चाई यह है कि खदानों से उड़ती यह महीन धूल,टीबी और सिलिकोसिस जैसी बीमारियों को किसी खैरात की तरह बांट रही है।यहां का आम आदमी मास्क नहीं पहनता,क्योंकि उसने धूल को ही अपनी नियति मान लिया है।

पश्चिमी सिंहभूम के सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति किसी अजायबघर से कम नहीं है।इमारतें खड़ी हैं,लेकिन अंदर या तो डॉक्टर नदारद हैं या दवाइयां। किरीबुरु,नोआमुंडी और गुआ जैसे इलाकों के मजदूरों के लिए सबसे बड़ा लाइफ सपोर्ट आज भी वह एम्बुलेंस है,जो उन्हें जमशेदपुर या रांची रेफर करने के लिए तैयार खड़ी रहती है।विश्व स्वास्थ्य दिवस पर हम आधुनिक मशीनों की बात करते हैं,जबकि यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आज भी एक अदद पट्टियों और मरहम के भरोसे चल रहे हैं।

बड़े शहरों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर जब नीति-निर्धारक स्वास्थ्य सूचकांकों पर चर्चा करते हैं, तो वे शायद यह भूल जाते हैं कि पश्चिमी सिंहभूम के गांवों में आज भी लाल पानी (आयरन युक्त जल) पीना मजबूरी है। विश्व स्वास्थ्य दिवस पर भाषणों की चमक और खदानों की धूल के बीच एक गहरा अंतर है। जब तक स्वास्थ्य नीतियां चाईबासा जिले की सड़कों पर उड़ती इस जानलेवा धूल को नहीं देख पाएंगी,तब तक हर साल 7 अप्रैल को मनाए जाने वाले इस दिवस का अर्थ यहां के आदिवासियों और मजदूरों के लिए केवल एक कलेंडर की तारीख से ज्यादा कुछ नहीं होगा।

इसे भी पढ़े: रायबरेली में 110 रेलवे आवास को गिराने की तैयारी,उच्च अधिकारियों को भेजी गई रिपोर्ट

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