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महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने पर विवाद, यूनियन ने जताया विरोध

Published: Oct 24, 2026 8:57 PM  •  Updated: Oct 24, 2026 8:58 PM
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महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने पर विवाद, यूनियन ने जताया विरोध

1 मई 2026 से भाषा दक्षता लागू करने की घोषणा का विरोध, चालकों को प्रशिक्षण और पर्याप्त समय देने की मांग

मुंबई।महाराष्ट्र में ऑटोरिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने के फैसले को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक की घोषणा के अनुसार, 1 मई 2026 से राज्य में लाइसेंस प्राप्त ऑटोरिक्शा और टैक्सी चालकों को मराठी पढ़ने, लिखने और बोलने में बुनियादी दक्षता हासिल करनी होगी। इस फैसले पर महाराष्ट्र ऑटोरिक्शा चालक-मालक संघटना संयुक्त कृती समिती ने विरोध जताते हुए सरकार से पुनर्विचार करने की मांग की है।

सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में काम करने वाले चालकों को स्थानीय भाषा का ज्ञान होना चाहिए, ताकि यात्रियों के साथ संवाद आसान हो और किसी तरह की गलतफहमी की स्थिति उत्पन्न न हो। इसके लिए परिवहन विभाग के 59 क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय कार्यालयों के माध्यम से चालकों की भाषा दक्षता की जांच करने की योजना बताई गई है।

वहीं, यूनियन के अध्यक्ष शशांक राव ने इस फैसले को चालकों पर अतिरिक्त दबाव डालने वाला कदम बताया है। उनका कहना है कि महाराष्ट्र में दूसरे राज्यों से आकर रोजगार करने वाले बड़ी संख्या में चालक भी हैं। ऐसे में उन्हें कम समय में मराठी सीखने के लिए बाध्य करना उनकी रोजी-रोटी पर असर डाल सकता है।

यूनियन ने सरकार से मांग की है कि नियम लागू करने से पहले चालकों को पर्याप्त समय दिया जाए और मराठी सीखने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए। संगठन का कहना है कि स्थानीय भाषा सीखने को प्रोत्साहित करना गलत नहीं है, लेकिन भाषा दक्षता के नाम पर जल्दबाजी में सख्त कार्रवाई और लाइसेंस रद्द करने की आशंका से चालकों की परेशानियां बढ़ सकती हैं।

इस फैसले को लेकर अब सरकार और चालक संगठनों के बीच सहमति बनाने की चुनौती सामने है। जहां सरकार स्थानीय भाषा के ज्ञान को यात्री सुविधा से जोड़ रही है, वहीं यूनियन इसे लागू करने के तरीके और समयसीमा पर सवाल उठा रही है।

 

 

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